• Lalita Tripathi

सिन्धु घाटी सभ्यता - ज़ायके का एतिहासिक सफ़र

किसी भी देश के खानपान या जायके की जड़े जुड़ी होती हैं, उस क्षेत्र या प्रान्त के इतिहास से, जो सदियों से परिपक्व होता हुआ आज हमारे खानपान का हिस्सा बना| हम सभी को विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन का आनंद लेना अच्छा लगता है, पर क्या आपने ये सोचा कि आखिर हमारी पाक़ कला का विकास कैसे हुआ| तो चलिए हम पलटते हैं इतिहास के पन्नो को और जानते हैं विश्व की प्राचीनतम नदी घाटी सभ्यताओ में से एक सिन्धु घाटी या हड़प्पा सभ्यता के बारे में|

मोहन जोदड़ो, सिन्ध प्रांत, पाकिस्तान

सन् 1826 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिक और खोजकर्ता चार्ल्स मासन का ध्यान एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय के तरफ आकर्षित हुआ कि पंजाब प्रान्त (अब पाकिस्तान का हिस्सा है) के खेतों से बहुत सी पुरानी ईंटें मिल रही हैं परन्तु समय के साथ ये बात नज़रंदाज़ हो गयी| सन् 1856 में कराची से लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान अलेक्जेंडर कान्निघम और बर्टन ब्रदर्स का भी ध्यान पंजाब प्रान्त के हड़प्पा में मिल रहे प्राचीन ईंटों पर गया और उन्होंने इसकी सूचना प्रशासन को दी |


इस घटना के कई साल बाद, सन् 1921 में दयाराम सहानी (पुरातत्त्ववेत्ता) ने हड़प्पा का उत्खनन कराया और विश्व को एक बहुत ही बड़ी सभ्यता के बारे में पता चला, जिसे हड़प्पा सभ्यता कहा जाने लगा| उस दौरान ये मान लिया गया कि संभवतः यह सभ्यता सिन्धु नदी की घाटी तक ही सीमित है अतः इस सभ्यता को सिन्धु घाटी की सभ्यता के नाम से जाना जाने लगा| सन् 1922 में इसी सभ्यता से जुड़े एक और विशाल नगर के अवशेष मिले जो मोहन जोदाड़ो के नाम से जाना जाता है। मोहन जोदाड़ो की खोज प्रसिद्ध इतिहासकार राखलदास बनर्जी ने किया था|


माना जाता है कि सिंधु घाटी की सभ्यता का इतिहास करीब 3300 ईसापूर्व से 1700 ईसा पूर्व तक रहा है, लेकिन अगर हम पूर्व हड़प्पा या नवताम्र पाषाण युग की बात करें तो ये सभ्यता करीब 8000 वर्ष पुरानी मानी जाती है|

दिसंबर 2014 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा हरियाणा के फतेहाबाद में किये गए शोध से पता चला कि इस जिले का एक छोटा सा गांव भिरड़ाना हड़प्पा सभ्यता का सबसे प्राचीन नगर है, जिसकी स्थापना करीब 7570 ईसा पूर्व में हुई थी। सन 2003-2004 में किए गए उत्खनन में इस प्राचीन नगर की खोज हुई थी| इसे प्रारंभिक खाद्य उत्पादकयुग भी कहते हैं|


प्रथमबार सुप्रंधित नगरों के प्रमाण मिलने के कारण सिन्धु घाटी सभ्यता को प्रथम नगरीकरण भी कहा जाता है| प्रगैतिहासिक काल में पहली बार कांस्य का प्रयोग हड़प्पा सभ्यता में ही मिला है, इसी वजह से इसे दक्षिण एशिया के कांस्य सभ्यता के रूप में जाना जाता है|


ये प्राचीन सभ्यता विश्व की अन्य सभी सभ्यताओं से बहुत ही विशाल थी| 2600 से 1900 ईसा पूर्व परिपक्व हड़प्पा या मध्य कांस्य युग आते आते इस सभ्यता का विस्तार करीब बीस लाख वर्ग किलोमीटर तक हो गया|

इस तरह से सिंधु सभ्यता ना केवल पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान तक सीमित रही बल्कि गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमांत क्षेत्रों तक फैली हुई थी|


हड़प्पा संस्कृति के करीब 1500 स्थलों को अब तक खोजा जा चुका है, इनमें अफगानिस्तान से 2, पाकिस्तान से 475 और सबसे अधिक 925 भारत में मिले हैं। इनमें कुछ प्रमुख स्थल हैं, हड़प्पा (पाकिस्तान - पंजाब प्रांत), मोहनजोदाड़ो (पाकिस्तान - सिंध प्रांत), लोथल (गुजरात- भारत), कालीबंगा (राजस्थान- भारत), बनावली( हरियाणा – हिसार जिला - भारत) और आलमगीरपुर है जोकि उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित है|


सिंधु और प्राचीन सरस्वती नदियों के किनारे बसी हड़प्पा सभ्यता के लोगों प्रमुख व्यवसाय कृषि और पशुपालन था| ऐसा माना जाता है कि सिंध प्रदेश आज के मुकाबले बहुत ही उपजाऊ था, इसका एक प्रमुख कारण हर वर्ष इस क्षेत्र में आने वाली बाढ़ थी| हर वर्ष मानसून के पश्चात इस सभ्यता के लोग इन मैदानों में खेती किया करते थे| हलों के अवशेष तो नहीं मिले हैं लेकिन कालीबंगा के उत्खनन से मिले साक्ष्यों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि इस सभ्यता के लोग पारंपरिक खेती किया करते थे|


हड़प्पा संस्कृति का प्रमुख अनाज गेहूं और जौं था| क्या आप जानते हैं कि गेहूं और जौं जो आज हमारे खाने का अहम अंग है वो मूल रूप से भारतवर्ष का है ही नहीं| माना जाता है गेहूं और जौं वेस्टर्न एशिया के प्राचीन यूफ्रेट्स घाटी (अभी ईरान, ईराक, टर्की और सीरिया का क्षेत्रों) में उगाया जाता था| सिन्धु सभ्यता के लोगों तक ये कब और कैसे पहुँचा, हम ये सटीक तो नहीं बता सकते लेकिन ऐसा लगता है कि माइग्रेशन या व्यापार इसका मुख्य कारण रहा होगा|

गेंहू का प्रयोग सिन्धु घटी सभ्यता में देखा जाता है

लोथल और मोहनजोदाड़ो में तंदूर जैसे चूल्हे के अवशेष मिले हैं जिसे देखकर ये प्रतीत होता है कि इस सभ्यता के लोग रोटी को तंदूर में पकाते रहे होंगे, यानी की तंदूर जिसकी आज दुनिया दिवानी है वो आदिकाल से चला आ रहा है।


गेहूं और जौं के अलावा इस सभ्यता के लोग मटर, ज्वार, राई की भी खेती किया करते थे| इसके अलावा वे सरसों और तिल भी उगाते थे| ऐसा माना जाता है कि संभवत: वे सरसों और तिल के तेल का उपयोग खाना बनाने में किया करते होंगे| कई प्रकार की दालों के साक्ष्य भी मिले हैं उनमें प्रमुख है मसूर, उड़द और मूंग| चावल के उपयोग के साक्ष्य केवल सीमित स्थानों पर मिले हैं उनमें लोथल और रंगपुर प्रमुख हैं|

कपास की खेती के प्रमाण सबसे पहले हड़प्पा सभ्यता में ही मिला है इसी नाम पर यूनान के लोग इसे सिंडन कहने लगे|


कपास की खेती के प्रमाण सबसे पहले हड़प्पा सभ्यता में ही मिला है

पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि इस सभ्यता के लोग फलों का भी उपयोग करते थे| सिंधु संस्कृति के लोग खरबूजा, तरबूज, बेर, आम, बेल और खजूर की खेती किया करते थे, इतना ही नहीं हड़प्पा संस्कृति में वेज और नॉनवेज दोनों के जायके का प्रमाण मिला है। सामान्य लोगों का खानपान बहुत ही सादा होता था ज्यादातर गेहूं या जौं की रोटिया, दाल और सब्जियों का सेवन करते थे| मीट और समुद्री भोजन के भी अवशेष मिले हैं|

भारत का सबसे लोकप्रिय फल आम का सिन्धु घाटी में भी खाया जाता था

उत्खनन में मिले बर्तनों के अवशेषों से ऐसा लगता है जिसे इस सभ्यता के लोग जायकों को बढ़ाने के लिए लहसुन, अदरक और हल्दी के प्रयोग से भली भांति परिचित थे| इसके अलावा काली मिर्च, धनिया, दालचीनी और जीरा जैसे मसालों से भी परिचित रहे होंगे| साक्ष्यों के आधार पर ऐसा माना जाता है कि इस संस्कृति के लोग मिठास के लिए शहद, खजूर और पाम का उपयोग किया करते होंगे|


हड़प्पा के लोग समुद्री और सेंधा नमक का उपयोग करते थे| कुछ इतिहासकारों के मुताबिक धोलावीरा क्षेत्र नमक की आपूर्ति किया करता होगा और ये किसी नहर या चैनल के द्वारा अरब सागर से जुड़ा होगा, हालांकि इस तरह के कोई जलमार्ग के सबूत नहीं मिले हैं|


पुरातात्विक उत्खनन में भेड़, बकरी, सूअर, भैंस, मुर्गियां, हाथी और ऊंट की हड्डियों के अवशेष मिले हैं, इससे ये लगता है कि संभवतः सिंधु घाटी के लोग इन्हें मवेशियों की तरह पालते थे और उनका उपयोग मीट, ऊन और दूध के लिए किया करते रहे होंगे| सिंधु क्षेत्र में हाथी पाए जाते थे, और वे लोग संभवत: हाथी का शिकार हाथी दांत या मांस के लिए किया करते थे|

सिन्धु घाटी सभ्यता में रथ

यही नहीं मिट्टी के बर्तन बनाने में ये लोग बहुत ही कुशल थे| मुख्यतः लाल मिटटी का प्रयोग करते थे| बर्तनों पर काले प्राकृतिक रंग से विभिन्न प्रकार की कलाकृतियां बनायी जाती थीं|

लाल मिटटी के बर्तन सिन्धु घाटी सभ्यता में देखने को मिलते हैं


व्यापार के दृष्टिकोण से भी ये प्राचीन सभ्यता काफी उन्नत थी, इसका प्रमाण पुरातात्विक उत्खनन में मिले मानकीकृत माप तौल और सील (मुहर) के अवशेष है| हड़प्पा सभ्यता के लोगों का व्यापारिक संबंध ईरान और अफगानिस्तान से काफ़ी अच्छा था| इसके अलावा प्राचीन समकालीन सभ्यता मेसोपोटामिया से भी अच्छे व्यापारिक संबंध रहे होंगे, इस बात का प्रमाण यहाँ मिले हड़प्पा कालीन सील (मुहर) से मिला है|


सिन्धु घाटी सभ्यता निश्चित ही एक बहुत ही समृद्ध मानव सभ्यता रही होगी, फिर ऐसा क्या हुआ होगा कि इतनी बड़ी और उन्नत सभ्यता इस तरह से वीरान हो गई| बहुत से इतिहासकार भी इस बारे में एकमत नहीं हैं| ऐसा माना जाता है की इसके पतन के कई कारण हो सकते हैं जैसे की जलवायु परिवर्तन, आक्रमण, भूकंप, पारिस्थिकीय असंतुलन, बाढ़, महामारी इत्यादि|


सिन्धु सभ्यता के पतन के चाहे जो भी कारण रहे हो, परन्तु इतना तो स्पष्ट है की यदि हम बात करें खानपान की तो निश्चित ही, इस प्राचीन सभ्यता ने भारतीय खानपान को एक अमूल्य विरासत दी है और हमें रुबरु कराया तमाम ज़ायकों से|

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