• Lalita Tripathi

चॉकलेट –एक मीठी ऐतिहासिक यात्रा

चॉकलेट दुनिया की सबसे लोकप्रिय मीठी ट्रीट है, हर किसी को ये बहुत ही पसंद है। चाहे चॉकलेट बार हो, चॉकलेट आइसक्रीम हो, हॉट चॉकलेट या चॉकलेट केक हो इसका स्वाद तो हर किसी को दीवाना बना देता है। चॉकलेट के इस जायके की दीवानगी के पीछे छिपा है एक विशाल इतिहास। चॉकलेट की उत्पत्ति और मौजूदा दौर के क्रेज के बीच काफी दिलचस्प फैक्ट्स जुड़े हैं। जायकानामा के इस सफर में चॉकलेट से जुड़ी उन तमाम दिलचस्प जानकारियों का जिक्र करेंगे जिनसे शायद आप अनजान हों|

विश्व कोको फाउंडेशन के अनुसार दुनिया भर में लोग एक वर्ष में 30 लाख टन से अधिक कोको बीन्स का सेवन करते हैं। चॉकलेट न केवल खाने में स्वादिस्ट होती है बल्कि इसे खाने से आप अच्छा महसूस करते हैं और यह आपके दिल और दिमाग के लिए भी अच्छा हो सकती है। डार्क चॉकलेट को सबसे बेहतर माना जाता है, क्योकि इसमें शुगर की मात्रा बेहद कम या नहीं के बराबर होती है।


ऐतिहासिक दृष्टि से कोकोआ बीन्स के प्रमाण लगभग 1500 ई० पू०के आसपास मिले, माना जाता है कि प्राचीन काल में कोकोआ बीज को पीस कर किसी उत्सव या खास मौको पर एक पेय पदार्थ के रूप में पीया जाता था|

पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर चॉकलेट के सेवन के प्रमाण ओल्मेक सभ्यता (2500-400 ई० पू०) में मिले हैं। ओल्मेक सभ्यता एक प्राचीनतम मेसोअमेरिकन सभ्यता मानी जाती है। ओल्मेक मेक्सिको में पहली प्रमुख सभ्यता थी। वे वर्तमान मैक्सिकन राज्यों के वेराक्रूज़, तबस्स्को और मैक्सिको की खाड़ी में उष्णकटिबंधीय तराई क्षेत्र में रहा करते थे। ओल्मेक सभ्यता के लोग कोकोआ बीन्स को पेय पदार्थ के रूप में उपयोग करते थे। संभवतः वो लोग खमीरयुक्त कोकोआ बीन्स को सुखाकर पत्थर पर पीसकर उसका पेस्ट बनाते थे और उसमे पानी और मसालों को मिलाकर चॉकलेट ड्रिंक तैयार करते थे।


चाँकलेट की प्रमुख सामग्री केको या कोको के पेड़ की खोज 2000 वर्ष पूर्व सेंट्रल अमेरि‍का के वर्षा वनों में की गई थी

ओल्मक सभ्यता के बाद चॉकलेट के इस्तेमाल के साक्ष्य माया सभ्यता में भी मिला है। प्राचीन माया सभ्यता ग्वाटेमाला, मैक्सिको, होंडुरास और यूकाटन प्रायद्वीप में स्थापित थी, यह मैक्सिको की एक महत्वपूर्ण सभ्यता थी। इस सभ्यता का आरम्भ 1500 ई० पू० में हुआ और 300 ई० से 900 ई० के दौरान अपनी उन्नति के शिखर पर पहुंची। पुरातात्वि अवशेषों के आधार पर ये माना जाता है की माया सभ्यता के लोग कोकोआ बीन्स की खेती किया करते रहे होंगे। ऐसा माना जाता है कि ओल्मक सभ्यता के लोगों की तरह ही माया सभ्यता के लोग भी कोकोआ बीन्स को चॉकलेट ड्रिंक्स की तरह ही पीया करते होंगे, इसके अलावा इसका स्वाद बढ़ाने के लिए दालचीनी और काली मिर्च का भी उपयोग किया करते होंगे। माया सभ्यता के लोग कोकोआ को भगवान् का भोजन मानते थे शायद इसी वजह से इसका उपयोग विशेष धार्मिक उत्सवों में किया जाता था।


कोकोआ बीन्स के उपयोग के साक्ष्य टोल्तेक सभ्यता (900- 1168 AD) और मध्यकालीन एज़्टेक साम्राज्य (1428-1521 AD) में भी मिला है। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर ये कहा जा सकता है की मध्यकाल तक आते – आते चॉकलेट का इस्तेमाल धार्मिक और चिकित्सकीय कार्यों में किया जाने लगा था।

कोकोआ के महत्त्व का अंदाज़ा हम इसी बात से लगा सकते हैं कि एज़्टेक साम्राज्य के लोग इसका उपयोग मुद्रा के रूप में भी किया करते थे। पुरातात्विक तथ्यों के आधार माना जाता है कि चॉकलेट शब्द मध्‍य अमेरि‍की एजटेक सभ्‍यता की देन है। एजटेक की भाषा नेहुटल में चॉकलेट शब्‍द का अर्थ होता है खट्टा या कड़वा। आपको शायद ये जानकार आश्चर्य होगा की प्राचीन काल में चॉकलेट तीखी हुआ करती थी, मेसोअमेरिकन लोग कोको बीजों को पीसकर उसमें वि‍भि‍न्‍न प्रकार के मसाले जैसे चि‍ली वॉटर और अन्य मसाले डालकर एक स्‍पाइसी और झागदार तीखा पेय पदार्थ बनाते थे।


चॉकलेट का प्रयोग एज़्टेक एम्पायर में भी देखा गया है

एजटेक साम्राज्य की राजधानी टेनोच्टिलन थी और वो वर्तमान मेक्सिको में बस गए थे। माना जाता है कि एज़टेक साम्राज्य के इस क्षेत्र में विस्तार की मुख्य वजह कोकोआ ही थी। सन 1502 में क्रिस्टोफ़र कोलम्बस पहले यूरोपियन माने जाते हैं जिन्होंने कोको बीन्स को देखा। ऐसा माना जाता है कि समुद्र में उन्हें एक नाव मिली जिसमें कोकोआ बीन्स रखा हुए थे, जो उन्हें बादाम जैसा प्रतीत हुआ और इन रहस्मयी बीजों को स्पेन के शाही दरबार के समक्ष पेश किया, परन्तु इसके उपयोग के बारे में समझा नहीं सके, इसी कारण ये समय के साथ नज़रंदाज़ हो गया।

हर्नान कोर्टेस संभवतः पहले यूरोपीय थे, जिन्होंने कोकोआ बीज के बारे में लोगों को जागरूक किया और लोकप्रिय बनाया।

माना जाता है सन 1528 में स्‍पेन ने जब मैक्‍सि‍को पर कब्‍जा कि‍या और एज़टेक साम्राज्य का पतन हुआ तो स्पेन के सैनिक हर्नान कोर्ते भारी मात्रा में कोको के बीजों और चॉकलेट बनाने के यंत्रों को अपने साथ स्‍पेन ले गये। हर्नान कोर्टेस संभवतः पहले यूरोपीय थे, जिन्होंने कोकोआ बीज के बारे में लोगों को जागरूक किया और लोकप्रिय बनाया।


चॉकलेट के कड़वे स्वाद को ख़त्म करने के लिए इसमें चीनी मिलाई जाने लगी, इसलिए हम ये कह सकते है की चॉकलेट को मीठा बनाने का श्रेय स्पेन को ही जाता है। जल्‍दी ही स्‍पेन में चॉकलेट, शाही दरबार और रईसों का लोकप्रिय ड्रिंक बन गया। बताया जाता है कि करीब 100 साल तक स्पेन और पुर्तगाल ने कोकोआ बीन्स को अपने पास ही रखा, इसी दौरान इन्होंने कोकोआ की खेती कैरेबियन देशों में करवाई। धीरे- धीरे कोकोआ का उत्पादन बढ़ने लगा और ये अन्य यूरोपीय देशों में प्रचलित होने लगा।

कोको का फल

फ्रेंसि‍स्‍को कारलेटी जो कि एक इटालियन यात्री थे, माना जाता है उन्होंने सबसे पहले चॉकलेट पर स्पेन के एकाधि‍कार को खत्‍म कि‍या। फ्रेंसि‍स्‍को कारलेटी ने मध्‍य अमेरि‍का के लोगों को चॉकलेट बनाते देखा और अपने देश इटली में भी चॉकलेट का प्रचार प्रसार कि‍या। सन 1606 तक इटली में भी चॉकलेट काफी प्रसिद्ध हो गई।

सन 1615 में फ्रांस ने ड्रिंकिंग चॉकलेट का स्‍वाद चखा, यहाँ के लोगों को चॉकलेट स्‍वास्‍थ्‍य की दृष्टि बहुत लाभदायक लगा। सन 1650 में जब ब्रिटेन ने जमैका पर अपना अधिपत्य स्थापित किया उसी दौरान उन्हें चॉकलेट के स्वाद और फ़ायदे के बारे में जानकारी हुई। जमैका में बहुतयात मात्रा में कोकोआ की खेती की जाती थी। अपने ख़ास स्वाद की वजह से ये ब्रिटेन में भी काफी लोकप्रिय हो गया।


माना जाता है सन 1651 में कोकोआ के बीज किसी दुर्घटनावश समुद्र में बहते हुए नार्थ अमेरिका के तट पर आ पंहुचा। बेकर चॉकलेट कंपनी संयुक्त राज्य अमेरिका में चॉकलेट का सबसे पुराना उत्पादक है। सन 1765 में डॉजेम्स बेकर और जॉन हैनॉन ने बोस्टन में कंपनी की स्थापना की। वेस्ट इंडीज के कोको बीन्स का उपयोग करते हुए, इस जोड़ी ने अपना चॉकलेट व्यवसाय बनाया, जो अभी भी चलन में है।


यूरोप में यात्रा के दौरान "व्हाइट कोट" कैंडीज का स्वाद चखने के बाद, व्हाइट चॉकलेट को पहली बार सन 1946 में अमेरिका के फ्रेडरिक ई हेबर्ट कैंडीज द्वारा शुर्स्बेरी, मैसाचुसेट्स में पेश किया गया था| कई औषधीय गुणों से परिपूर्ण चॉकलेट को प्राचीन और मध्यकाल में चिकित्सकीय कार्य में भी उपयोग किया जाता था। 17वीं और 18वीं शताब्दी में कई डॉक्टर्स ने इसके गुणों पर काफी शोध किये और पाया की इसमें बहुत से औषधीय गुण विद्यमान हैं। कोकोआ में कुछ फाइटोकेमिकल्स होते हैं। कोकोआ में फ्लेवोनोइड स्वाभाविक रूप से मौजूद होते हैं लेकिन चूंकि वे कड़वे होते है इसलिए उन्हें अक्सर चॉकलेट से निकाल दिया जाता है, यहां तक ​​कि डार्क चॉकलेट से भी। हालांकि फ्लेवोनोइड दूध चॉकलेट में मौजूद होते हैं| फ्लेवोनॉयड्स एंटी-इंफ्लेमेटरी और इम्यून सिस्टम बेनिफिट के साथ शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट है। मध्य काल तक कोकोआ बीज का इस्तेमाल बहुत से रोगों में किया जाता था। हालांकि आधुनिक विज्ञान कुछ ऐतिहासिक दावों का समर्थन नहीं करता है।

व्हाइट चॉकलेट को पहली बार सन 1946 में अमेरिका के फ्रेडरिक ई हेबर्ट कैंडीज द्वारा शुर्स्बेरी, मैसाचुसेट्स में पेश किया गया था

फ्रेंच और इंडियन (मूल अमेरिकी) वार (सन 1754–1763) और द्वितीय विश्व युद्ध (सन 1939 – 1945) में सैनिको के राशन में चॉकलेट का भी उपयोग किया गया था। सन 1828 में एक डच केमिस्ट कोएनराड जोहान्स वैन हाउटन ने कोकोआ बीन्स से वसा(कोकोआ मक्खन) अलग करने की तकनीकी का पता लगाया। कोकोआ बीन्स का केंद्र, जिसे "निब" के रूप में जाना जाता है, में औसतन 54% कोकोआ मक्खन होता है, जो एक प्राकृतिक वसा है। वैन हाउटन की मशीन, जो की एक हाइड्रोलिक प्रेस था, इस मशीन ने कोकोआ मक्खन सामग्री को लगभग आधा कर दिया। इसने एक "केक" बनाया जिसे कोको पाउडर में डाला जा सकता था, जो सभी चॉकलेट उत्पादों का आधार बना।


कोको पाउडर की शुरूआत ने न केवल चॉकलेट पेय बनाना बहुत आसान बना दिया, बल्कि चीनी के साथ पाउडर को मिलाना भी संभव बना दिया और ठोस बनाने के लिए इसे कोकोआ मक्खन के साथ रीमिक्स किया, इस पूरे प्रोसेस का रंग रूप बिलकुल आज खाए जाने वाले चॉकलेट जैसा ही था।

सन 1847 में अंग्रेजी चॉकलेट कम्पनी के निर्माता जे.एस. फ्राई एंड संस नेकोएनराड जोहान्स वैन हाउटन की तकनीक का इस्तेमाल कर पहली चॉकलेट बार का निर्माण किया। यह खाने में थोडा किरकिरा था लेकिन फिर भी काफी मशहूर हो गया।

स्विस चॉकलेट दुनिया भर में मशहूर है

स्विस चॉकलेट निर्माता डैनियल पीटर ने सन 1875 में मिल्क चॉकलेट को लोगों के सामने पेश किया।

सन 1879 रोडोलफे लिंड्ट, जो कि एक स्विस चॉकलेट निर्माता थे उन्होंने चॉकलेट में किरकिराहट की समस्या का समाधान किया। उन्होंने लिंड्ट चॉकलेट फैक्ट्री की स्थापना की और चॉकलेट की गुणवत्ता में सुधार के लिए कोन्चिंग मशीन का आविष्कार किया। इस मशीन में उन्होंने तीन दिनों तक इंग्रीडिएंट्स को मिश्रित किया, इस पूरी प्रक्रिया को कोन्चिंग कहा जाने लगा क्योंकि लिंड्ट की मशीन एक समुद्री शंख के सामान दिखती थी।

चॉकलेट के निर्माण प्रक्रिया में टेम्परिंग का आविष्कार एक और मील का पत्थर साबित हुआ| इस प्रक्रिया में चॉकलेट के टेंप्रेचर को बार-बार बढ़ाने और कम करने से एक चमकदार सतह और टूटने पर एक आकर्षक स्नैप के साथ एक चॉकलेट बार का उत्पादन होता है| सन 1900 तक आते - आते चॉकलेट की दुनिया में काफी इनोवेशन हुए जिसने आधुनिक चॉकलेट के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया और आज चॉकलेट पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया।


यही नहीं हमारा ये अलबेला चॉकलेट तो स्पेस और चन्द्रमा की भी सैर कर चुका है। 12 अप्रैल, 1961 में सोवियत संघ के अंतरिक्ष यात्री यूरी गगारिन अपने साथ चॉकलेट भी अंतरिक्ष में ले गए थे। यूरी अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम मानव थे। 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में चॉकलेट ने अमेरिकी अपोलो मिशन में चंद्रमा की भी यात्रा की।


चॉकलेट के लिए नया क्रेज इसके साथ एक बड़ा स्लेव बाज़ार लेकर आया। 17 वीं-19 वीं सदी के अंत में बड़ी मात्रा में कोकोआ बीन्स का उत्पादन होने लगा और ये कठिन और धीमी गति का उत्पादन पहले मेसोअमेरिकन मजदूरों से कराया जाता था, परन्तु बीमारी और अन्य कारणों से मजदूरों की उपलब्धता काफी कम हो गई, इसी वजह से ये कार्य अफ्रीकन और एशियाई दासों से कराया जाने लगा। अन्य महाद्वीपओ में कोकोआ के प्रसार की मुख्य वजह अंग्रेजी, डच और फ्रांसीसी उपनिवेशवाद रहा है।

सन 1965 एक ब्रिटिश कंपनी कैडबरी ने केरल के वनाड जिले के चुंडले में व्यवसायिक रूप से भारी मात्रा में खेती करना प्रारम्भ किया

भारत में चॉकलेट करीब 18वीं सदी के आसपास आया और उपनिवेशवाद इसकी मुख्य वजह रही है।

माना जाता है कि सरदेसाई नामक व्यक्ति ने पहले विश्व युद्ध के दौरान चॉकलेट बनाने की एक फैक्ट्री की स्थापना की। इन्होंने इस फैक्ट्री की स्थापना बेलिमोरा (नवसारी डिस्ट्रिक्ट-गुजरात) में की, जो ब्रिटिश इंडिया के वक़्त बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा थी, परन्तु ये फैक्ट्री ज्यादा दिन नहीं चल सकी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही एक अन्य कंपनी सांथी बिस्किट और चॉकलेट कंपनी लिमिटेड की भी स्थापना पुणे में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही हुई और युद्ध के समाप्ति से पहले तक, बॉम्बे, आगरा और मद्रास में चॉकलेट के और कारखाने भी खुल गए। भारत के स्वतंत्र होने तक,लगभग 550 टन कोको पाउडर और चॉकलेट का निर्माण भारत में किया गया।

सन 1960- 1970 के दौरान भारत में चॉकलेट की दुनिया में ये बड़ा बदलाव आया। सन 1965 एक ब्रिटिश कंपनी कैडबरी ने केरल के वनाड जिले के चुंडले में व्यवसायिक रूप से भारी मात्रा में खेती करना प्रारम्भ किया।

1970 के शुरुआत में, मोंडेलेज़ इंडिया फूड्स प्राइवेट लिमिटेड (पूर्व कैडबरी इंडिया लिमिटेड) ने किसानों को मुफ्त रोपण सामग्री और तकनीकी ज्ञान दिया, जिससे कोकोआ की खेती काफी बड़े स्तर पर किया जाने लगा। केंद्रीय वृक्षारोपण फसल अनुसंधान संस्थान (CPCRI) ने 1972 में कोको पर शोध शुरू किया और केरल कृषि विश्वविद्यालय (KAU) ने 1979 में इसका अनुसरण किया। इंटरक्रॉप के रूप में वर्तमान में इसकी खेती केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में की जाती है।


भारतवर्ष में चॉकलेट की लोकप्रियता समय के साथ बढ़ती रही और और आज तो चॉकलेट की पहुंच घर-घर तक हो गई है, भारत एक बहुत बड़े उपभोक्ता के रूप में उभरा है। विश्व में भारत, करीब 1% चॉकलेट का उत्पादन करता है।


दुनिया के कोकोआ का लगभग दो-तिहाई पश्चिमी अफ्रीका में उत्पादन किया जाता है, जिसमें आइवरी कोस्ट सबसे बड़ा स्रोत है, जिसकी कुल फसल करीब 1,448,992 टन है। इसके अलावा घाना, नाइजीरिया और कैमरून दुनिया के शीर्ष 5 कोको उत्पादक देश हैं।

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