• Lalita Tripathi

जीवन की आधार देवी अन्नपूर्णा

Updated: Sep 8

मनुष्य जीवन का एक ऐसा आधार जिसके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। जीवन को चलाने के लिए ये एकमात्र ऐसा सहारा है जिस पर पूरी सृष्टि टिकी है। ये है अन्न जो हममें प्राण भरता है, हमें शक्ति देता है जीने की, और इस अन्न के लिए दुनिया क्या क्या नहीं करती है। लेकिन अन्न को देने वाली अधिष्ठात्री कौन है और कैसे देवी ने पृथ्वी पर आकर हम सबको अन्न से अवगत कराया, कैसे त्राहि त्राहि कर रही पृथ्वी को अन्न की संपदा से भर दिया अन्नपूर्णा देवी ने। आइए जानते हैं अन्नपूर्णा देवी की वो कहानी जिससे हमें पता चलेगा कि किस तरह अन्न की उत्तपति हुई किस तरह से उन्होने हमारे लिए अन्न का अपना भंडार खोला।


अन्नपूर्णा का जैसा कि नाम से स्पष्ट है अन्न और अन्न को देने वाली। अन्न का शाब्दिक अर्थ है- धान्य' (अन्न) यानी की अन्न की अधिष्ठात्री। अन्नपूर्णा की कहानी उतनी ही रोचक है जितना वो हम मनुष्यों का भरण पोषण करने के लिए अन्न उपजाया। सृष्टि के साथ समस्त सृष्टि के स्वामी देवाधिदेव महादेव को भी मां अन्नपूर्णा ही भोजन प्रदान करती हैं।


जगत्माता जगदंबा के अन्नपूर्णा स्वरुप धारण करने की कथा बेहद अलौकिक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार एक बार देवताओं ने एक मत होकर ब्रह्म को माया से भी श्रेष्ठ बता दिया. भगवान शिव ने इस बात का अनुमोदन किया और कहा कि भोजन भी माया ही है। जैसे ही माता पार्वती ने देवताओं और अपने पति की ऐसी बातें सुनीं उन्हें अत्यंत क्रोध आ गया। समस्त संसार को चलाने वाली महामाया जगदंबा को ये क्रोध इतना अत्यधिक था कि उन्होंने अपनी माया को ही समेट लिया जिसके फलस्वरुप समस्त सृष्टि में अन्न यानी की भोजन का अकाल पड़ गया। चारो ओर त्राहि - त्राहि मचने लगा। अब ऐसे में भगवान शिव को समझने में ज़रा भी देर नहीं लगी कि जगदंबा क्रोधित हो गई हैं। अब उन्हें प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने भिक्षुक का रुप धारण किया और पहुंच गए काशी, और पहुंचकर उन्होंने समस्त संसार का पोषण करने वाली जगदंबा से भिक्षा के रुप में अन्न की मांग की।


अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकर प्राण वल्लभे।

ज्ञान वैराग्य सिद्धयर्थ भिखां देहि च पार्वति।।


भिक्षुक को इस तरह दीन पुकार करते देख माता पार्वती पूरी तरीके से पिघल गईं और जब वो भिक्षा देने के लिए आईं तो उन्होंने देखा की समस्त सिद्धियों के स्वामी उनके पति महादेव ही भिक्षुक रुप में सामने मौजूद हैं और उन्हें ऐसी दीन स्थिति में देखकर माता का क्रोध पल में दूर हो गया, वो तुरंत समझ गईं कि महादेव को महामाया आदिशक्ति के महत्व का आभास हो चुका है और उन्होने अपनी माया को ठीक कर दिया और भगवती ने कृपा करके महादेव को खीर के रुप में भोजन प्रदान किया। और जिससे भोलेनाथ संतुष्ट हुए तो उनके साथ समस्त सृष्टि भी तृप्त हो गई। जगदंबा ने शाकंभरी स्वरुप में सृष्टि के समस्त भोज्य पदार्थों का निर्माण किया था।



कलियुग में माता अन्नपूर्णा की पुरी काशी मानी गई है लेकिन माता अन्नपूर्णा के नियंत्रण में सम्पूर्ण जगत् है ।बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में अन्नपूर्णाजी के आधिपत्य की भी कथा बडी रोचक है। भगवान शंकर से विवाह के बाद पार्वती के साथ कैलाश पर रहने लगे थे। ये पार्वती का घर था लेकिन उस वक्त देवी ने अपने मायके में निवास करने के बजाय अपने पति की नगरी काशी में रहने की इच्छा व्यक्त की और फिर शिव शंभू उन्हें साथ लेकर अपने सनातन गृह अविमुक्त-क्षेत्र (काशी) आ गए। उस दौर की काशी केवल एक महाश्मशान नगरी हुआ करती थी।पार्वती को सामान्य गृहस्थ स्त्री की तरह ही अपने घर को ऐसे मात्र श्मशान होना बिल्कुल भी नहीं भाया और इस पर मंथन के बाद एक अच्छी व्यस्था बनी ये व्यवस्था की कि सत्य, त्रेता, और द्वापर, इन तीन युगों में काशी श्मशान रहेगी और कलियुग में यह अन्नपूर्णा की पुरी होकर बसे और यही वजह है कि वर्तमान समय में अन्नपूर्णा का मंदिर काशी का प्रधान देवीपीठ हुआ। मां अन्नपूर्णा का प्रसिद्ध मंदिर बनारस में काशी विश्वनाथ के मंदिर के ठीक पास में है। और काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद यहां दर्शन करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है।मां अन्नपूर्णा के काशी में निवास करने के बाद काशी को यह वरदान मिला कि यहां कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोएगा। मां अन्नपूर्णा भक्तों को भोग के साथ मोक्ष भी प्रदान करती हैं।सम्पूर्ण विश्व के अधिपति विश्वनाथ की अर्धांगिनी अन्नपूर्णा सबका बिना किसी भेद-भाव के भरण-पोषण करती हैं।माना जाता है जो अन्न का अपमान नहीं करता और अन्न को एक वरदान की तरह मानता है और जो भी भक्ति-भाव से माता का अपने घर में आह्वान करता है, माँ अन्नपूर्णा उसके यहां अवश्य वास करती हैं और ऐसे भक्तों को कभी जीवन में भोजन की कमी महसूस नहीं होती।अन्नपूर्णा माता की जयंती की भी मान्यता है । मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को अन्नपूर्णा जयंती के रूप में मनाया जाता है। इसके अलावा मान्यता है कि अन्नपूर्णाजी की चैत्र तथा आश्विन के नवरात्र में अष्टमी के दिन 108 परिक्रमा करने से अनन्त पुण्य फल प्राप्त होता है। अन्नपूर्णा मंत्रोंच्चार से घर में धन धान्य और अन्न की कभी कमी नही रहती है।


अन्नपूर्णा मंत्र इस प्रकार है-

रक्ताम्विचित्रवसनाम्नवचन्द्रचूडामन्नप्रदाननिरताम् स्तनभारनम्राम्।

नृत्यन्तमिन्दुशकलाभरणंविलोक्यहृष्टांभजेद्भगवतीम् भवदु:खहन्त्रीम्॥


इस मंत्र के ज़रिए मां अन्नपूर्णा के स्वरुप की व्याख्या की गई है। अर्थात 'जिनका शरीर रक्त वर्ण का है. जो अनेक रंग के धागों से बुना वस्त्र धारण करने वाली हैं. जिनके मस्तक पर बालचंद्र विराजमान हैं, जो तीनों लोकों के वासियों को सदैव भोजन प्रदान करती हैं, चिर यौवन से सम्पन्न जगदंबा भगवान शंकर को अपने सामने नृत्य करते देख प्रसन्न होती हैं. संसार के सब दु:खों को दूर करने वाली, ऐसी भगवती अन्नपूर्णा का मैं सदैव स्मरण करता हूँ /करती हूं। शास्त्रों के अनुसार अन्न में मां अन्नपूर्णा का वास माना गया है। अन्नपूर्णा की कहानी हमारे जीवन के लिए एक प्रेरणा है कि कैसे विश्व में सामंजस्य बनाने के लिए हमें हर किसी के महत्व को भली प्रकार समझना चाहिए ताकि जीवन के पहियों को सुचारु रुप से चलाया जा सके। भोजन करने से पहले मां अन्नपूर्णा को प्रणाम किया जाता है सबसे पहले पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने के लिए मां अन्नपूर्णा को धन्यवाद दिया जाता है। और फिर ये जो भोजन हम ग्रहण करने जा रहे हैं वो हमारे स्वास्थ्य के लिए हितकर हो।

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